Thursday, August 30, 2012

जब हवा चलती है…..

 जब हवा चलती है….. 

बहुत  समय  पहले  की  बात  है , आइस्लैंड के उत्तरी छोर पर  एक  किसान  रहता  था . उसे  अपने  खेत  में  काम  करने  वालों  की  बड़ी  ज़रुरत  रहती  थी  लेकिन  ऐसी  खतरनाक  जगह , जहाँ  आये  दिन  आंधी  –तूफ़ान  आते  रहते हों , कोई  काम  करने  को  तैयार  नहीं  होता  था .

किसान  ने  एक  दिन  शहर  के  अखबार  में  इश्तहार  दिया  कि  उसे   खेत  में   काम  करने  वाले एक मजदूर की  ज़रुरत  है . किसान से मिलने कई  लोग  आये  लेकिन  जो भी  उस  जगह  के  बारे  में  सुनता  , वो काम  करने  से  मन  कर  देता . अंततः  एक  सामान्य  कद  का  पतला -दुबला  अधेड़  व्यक्ति  किसान  के  पास  पहुंचा .

किसान  ने  उससे  पूछा  , " क्या  तुम  इन  परिस्थितयों  में   काम  कर  सकते  हो ?"

" ह्म्म्म , बस जब  हवा चलती  है  तब  मैं  सोता  हूँ ." व्यक्ति  ने  उत्तर  दिया .

किसान  को  उसका  उत्तर  थोडा अजीब  लगा  लेकिन  चूँकि  उसे  कोई  और  काम  करने  वाला  नहीं  मिल  रहा  था इसलिए  उसने  व्यक्ति  को  काम  पर  रख  लिया.

 मजदूर मेहनती  निकला  ,  वह  सुबह  से  शाम  तक  खेतों  में  म्हणत  करता , किसान  भी  उससे   काफी  संतुष्ट  था .कुछ ही दिन बीते थे कि  एक   रात  अचानक  ही जोर-जोर से हवा बहने  लगी  , किसान  अपने  अनुभव  से  समझ  गया  कि  अब  तूफ़ान  आने  वाला  है . वह   तेजी  से  उठा  , हाथ  में  लालटेन  ली   और  मजदूर  के  झोपड़े  की  तरफ  दौड़ा .

" जल्दी  उठो , देखते  नहीं  तूफ़ान  आने वाला  है , इससे  पहले  की  सबकुछ  तबाह  हो जाए कटी फसलों  को  बाँध  कर  ढक दो और बाड़े के गेट को भी रस्सियों से कास दो ." किसान  चीखा .

मजदूर बड़े आराम से पलटा  और  बोला , " नहीं  जनाब , मैंने  आपसे  पहले  ही कहा था  कि  जब  हवा  चलती  है  तो  मैं  सोता  हूँ !!!."

यह  सुन  किसान  का  गुस्सा  सातवें  आसमान  पर  पहुँच  गया ,  जी  में आया  कि  उस  मजदूर  को   गोली  मार  दे , पर  अभी  वो आने  वाले  तूफ़ान  से चीजों को बचाने  के  लिए  भागा  .

किसान खेत में पहुंचा और उसकी आँखें आश्चर्य से खुली रह गयी , फसल  की गांठें  अच्छे  से  बंधी  हुई   थीं  और  तिरपाल  से  ढकी  भी  थी , उसके  गाय -बैल  सुरक्षित बंधे  हुए  थे  और  मुर्गियां  भी  अपने  दडबों  में  थीं … बाड़े  का  दरवाज़ा  भी  मजबूती  से  बंधा  हुआ  था . साड़ी  चीजें  बिलकुल  व्यवस्थित  थी …नुक्सान होने की कोई संभावना नहीं बची थी.किसान  अब   मजदूर की ये  बात  कि  " जब  हवा चलती है  तब  मैं  सोता  हूँ "…समझ  चुका  था , और  अब  वो  भी  चैन  से   सो  सकता  था .

मित्रों ,  हमारी  ज़िन्दगी  में भी कुछ ऐसे तूफ़ान आने तय हैं , ज़रुरत इस बात की है कि हम  उस  मजदूर की  तरह पहले से तैयारी कर के रखें ताकि  मुसीबत  आने  पर  हम भी चैन  से  सो सकें.  जैसे कि यदि कोई विद्यार्थी शुरू से पढ़ाई करे तो परीक्षा के समय वह आराम से रह सकता है, हर महीने बचत करने वाला व्यक्ति पैसे की ज़रुरत पड़ने पर निश्चिंत रह सकता है, इत्यादि.

तो चलिए हम भी कुछ ऐसा करें कि कह सकें – " जब हवा चलती है तो मैं सोता हूँ."

Thursday, August 23, 2012

Business सफल बनाने के 10 Golden Rules

Business सफल बनाने के 10 Golden Rules

Sam Walton Walmart in Hindi

Sam Walton : The Retail King

  Business  सफल बनाने के 10 Golden Rules

Rule 1: अपने  व्यवसाय  के  प्रति  समर्पित रहिये :

आपको  अपने  business में  किसी  भी  और  व्यक्ति  से  ज्यादा  यकीन  होना  चाहिए . यदि  इंसान  में  अपने  काम  के  प्रति  passion है  तो  वो  अपने  अन्दर  की  सारी  खामियों  से  पार  पा  लेगा . मुझे  नहीं  पता  कि  आदमी  passion के  साथ  पैदा  होता  है  या  वो  इसे  develop कर  सकता  है . पर   मैं  इतना  जानता  हूँ  कि आपको  इसकी  ज़रुरत  पड़ती  है .  यदि आप अपने काम से प्रेम करते हैं तो, तो आप हर रोज़ उसे best possible way में करना चाहेंगे ,और जल्द ही आपके साथ काम करने वाले भी किसी बुखार की तरह इसे आपसे catch कर लेंगे.

Rule 2: Profit को सभी काम करने   वालों  में  बाटिये  और  उन्हें  partner की  तरह  treat करिए :

बदले  में   employees भी  आपको as a  partner treat करेंगे  और  तब  आप  जितना  सोच  नहीं  सकते  उससे  भी  अच्छा  कर  पायेंगे . आप  चाहें   तो  company पर  अपना  control बनाये  रखिये  मगर  एक  सेवक  के  रूप  में  lead करिए . अपने  साथियों  को  company के  stocks खरीदने  के  लिए  encourage करिए  और  retirement के  समय  उन्हें  discounted stocks दीजिये .शायद  हमने  आज  तक  जो  कुछ  भी  किया  उनमे  से  ये  सबसे  महत्त्वपूर्ण  चीज  थी .

Rule 3: Motivate your partners. अपने  partners को  motivate कीजिये :

सिर्फ  पैसा  और  ownership काफी  नहीं  है .हर  रोज़  नए  innovative तरीकों  से  अपने  partners को motivate और  challenge कीजिये . बड़े  लक्ष्य  निर्धारित  करिए  , competition को  बढ़ावा  दीजिये  …अगर  माहौल  फीका  पड़  रहा  हो  तो  एक  manager की  जॉब  दूसरे  से  switch कीजिये  और  उन्हें  बेहतर  करने  के  लिए  उत्साहित  कीजिये . अपने  आपको  बहुत  predictable मत  बनाइये , लोगों  को  guess करने  दीजिये  की  आपकी  अगली  trick क्या  होगी .

Rule 4: अपने  partners को  हर  संभव  चीज  communicate कीजिये :

ऐसा  करने  से  वो  business को  बेहतर  समझ  पायेंगे  , और  जितना  अधिक  वो  समझेंगे  उतनी  ज्यादा  care करेंगे . और  जब  वो  care करने  लगेंगे  तब  उन्हें  कोई  रोक  नहीं  सकता . यदि  आप  अपने  associates से  बातें  छुपायेंगे  तो  वो  देर -सबेर  समझ  जायेंगे  कि  आप  उनको  partner नहीं  consider करते  हैं . सूचना  शक्ति  है  , अपने  asoocites को  empower करके  आपको  जो  फायदा  होता  है  वो  competitor को  बात  का  पता  चलने  से  होने  वाले  नुकसान  से  कहीं  अधिक  है .

Rule 5: Associates business के  लिए  जो  करते  हैं  उसकी  प्रशंशा  कीजिये :

Salary और  share देने  से  आपको  एक  तरह  की  loyalty मिलेगी . लेकिन  हर  कोई  अपने  काम  की  प्रशंशा  सुनना  चाहता  है . हम  अक्सर  अपनी  प्रशंशा सुनना  चाहते  हैं , और  खासतौर  पर  तब  जब  हम  अपने  किसी  काम  पर  proud feel कर  रहे  हों . सही  समय  पर  , सही  शब्दों  द्वारा  की  गयी  सच्ची  प्रशंशा  का  कोई  विकल्प  नहीं  है . ये  बिलकुल  फ्री  होते  हुए  भी  एक  खजाने  के  बराबर  होती  है .

Rule 6: Celebrate your success. अपनी  सफलता को  celebrate करिए :

यदि  आप  असफल  हों  तो  उसमे  कुछ  humour खोजिये . अपने  आप  को  बहुत  seriously मत  लीजिये . जब  आप  tension free होंगे  तो  आपके  साथ  के  लोग  भी  हल्का  महसूस  करेंगे .उत्साह  दिखाइए – हमेशा . जब  सब  fail  हो  जाए  तो  रंग  बिरंगे  कपडे  पहन   कर  कोई  silly गाना  गिये . और  फिर  सभी  को  अपने  साथ  गाने  को  कहिये . अपनी  कामयाबी  का  जश्न  मानाने  के  लिए  Wall Street पर  मत  नाचिये . ये  किया  जा  चुका  है . कुछ  नया  सोचिये , ये  सब  जितना  हम  सोचते  हैं  उससे  कहीं  अधिक  ज़रूरी  है  और  मस्ती  से  भरा  हुआ  भी , और  इससे  competitor भी  मूर्ख  बन  जाते  हैं .

Rule 7: अपनी  कंपनी  में  हर  किसी  को  सुनिए  और  ऐसा  उपाय  निकालिए  कि  वो  आपस  में  बात  करें :

जो  सामने  बैठते  हैं —वो  जो  customer  से  बात  करते  हैं —सिर्फ  वही  जानते  हैं  कि  वहां  क्या  चल  रहा  है . इसलिए  ये  जानने  की  कोशिश  कीजिये   कि  वो  क्या  जानते  हैं .Total Quality  बस  यही  है . अपनी  संस्था  में  नीचे  तक  responsibility push करने  के  लिए  और  नयी  ideas को  सामने  लेन  के  लिए  ज़रूरी  है  कि  आप  यह  जानने  की  कोशिश  करें  कि  आपके  associate क्या  कहना  चाहते  हैं .

Rule 8: अपने  customers को  उम्मीद  से  ज्यादा  दीजिये :

यदि  आप  ऐसा  करेंगे  तो  वो  बार – बार  वापस  आयेंगे . उन्हें  वो  दीजिये  जो  वो  चाहते  हैं —और  फिर उससे  थोडा  ज्यादा . उन्हें  पता  चलना  चाहिए  की  आप  उनको  appreciate करते  हैं . अपनी  सभी  गलतियों  को  स्वीकारिये  और excuse मत दीजिये  —माफ़ी  मांगिये .आप  जो  कुछ  भी  करते  हैं  उसके  पीछे  खड़े  रहिये . आज  तक  दो  सबसे  ज़रूरी  शब्द  जो  मैंने  पहले  Wal-Mart sign के  नीचे  लिखे  थे : "Satisfaction Guaranteed" . वो  आज  भी  ऐसे  ही  लिखे  हुए  हैं  और  उनकी  वजह  से  इतना  सब  कुछ  हो  पाया .

Rule 9: अपने  खर्चों  को  competition से  बेहतर  ढंग  से  control कीजिये :

यहीं   पर  आप  competitive advantage पा  सकते  हैं . लगातार  25 सालों  से  – Wal-Mart के  देश  के  सबसे  बड़े  retailer बनने  से  पहले — हम  इस  industry  में  lowest Expense to Sales ratio में  No.1 रहे  हैं , आप  बहुत  सारी  गलतियाँ  कर  के  भी  दुबारा  उबर  सकते  हैं  यदि  आपके  operations efficient हों . या  आप  बहुत  brilliant होते  हुए  भी  business से  बाहर  हो  सकते  हैं  अगर  आप  बहुत  inefficient हों .

Rule 10: धारा  के  विपरीत  तैरिये :

 दूसरी   तरफ  जाइये . Conventional Wisdom को छोड़िये . अगर  हर  कोई  काम  को  एक ही  तरह  से  कर  रहा  है  तो बहुत  ज्यादा  chance है  कि  आप  ठीक  उलटी  दिशा  में  जाकर  अपना  niche  पा  सकते  हैं .पर  इस  बात  के  लिए  तैयार  रहिये  कि  आपको  बहुत  सारे  लोग  ये  इशारा  करेंगे की  आप  गलत  दिशा  में  जा  रहे  हैं . मुझे  लगता  है  कि  मैंने  इन  तमाम  सालों  में  किसी  और  बात  से अधिक ये  सुना  है  कि : 50,000 से  कम  आबादी  वाला  town एक  discount store को  ज्यदा  समय  तक  support नहीं  कर  सकता

————————————————

Tuesday, August 14, 2012

पचास का नोट

पचास का नोट

एक  व्यक्ति  office में देर  रात तक काम  करने  के  बाद  थका -हारा घर  पहुंचा  . दरवाजा  खोलते  ही  उसने  देखा  कि  उसका  पांच  वर्षीय  बेटा  सोने  की  बजाये  उसका  इंतज़ार  कर  रहा  है .

अन्दर  घुसते  ही  बेटे  ने  पूछा —" पापा  , क्या  मैं  आपसे  एक  question पूछ  सकता  हूँ ?"

" हाँ -हाँ  पूछो , क्या  पूछना  है ?" पिता  ने  कहा .

बेटा - " पापा , आप  एक  घंटे  में  कितना  कमा लेते  हैं ?"

" इससे  तुम्हारा  क्या  लेना  देना …तुम  ऐसे  बेकार  के  सवाल  क्यों  कर  रहे  हो ?" पिता  ने  झुंझलाते  हुए  उत्तर  दिया .

बेटा - " मैं  बस  यूँही जानना  चाहता  हूँ . Please  बताइए  कि  आप  एक  घंटे   में  कितना  कमाते  हैं ?"

पिता  ने  गुस्से  से  उसकी  तरफ  देखते  हुए  कहा , " 100 रुपये  ."

"अच्छा ", बेटे  ने  मासूमियत   से   सर  झुकाते   हुए  कहा -, "  पापा  क्या  आप  मुझे  50 रूपये  उधार  दे  सकते  हैं ?"

इतना  सुनते  ही  वह   व्यक्ति  आग  बबूला  हो  उठा , " तो  तुम इसीलिए  ये  फ़ालतू  का  सवाल  कर  रहे  थे ताकि  मुझसे  पैसे  लेकर तुम  कोई  बेकार  का  खिलौना   या  उटपटांग  चीज  खरीद  सको ….चुप –चाप  अपने  कमरे  में  जाओ  और  सो  जाओ ….सोचो  तुम  कितने  selfish हो …मैं  दिन  रात  मेहनत  करके  पैसे  कमाता  हूँ  और  तुम  उसे  बेकार  की  चीजों  में  बर्वाद  करना  चाहते  हो "

यह सुन बेटे  की  आँखों  में  आंसू  आ  गए  …और   वह  अपने  कमरे  में चला गया .

व्यक्ति  अभी  भी  गुस्से  में  था  और  सोच  रहा  था  कि  आखिर  उसके  बेटे  कि ऐसा करने कि  हिम्मत  कैसे  हुई ……पर  एक -आध  घंटा   बीतने  के  बाद  वह  थोडा  शांत  हुआ , और  सोचने  लगा  कि  हो  सकता  है  कि  उसके  बेटे  ने  सच -में  किसी  ज़रूरी  काम  के  लिए  पैसे  मांगे  हों , क्योंकि  आज  से  पहले   उसने  कभी  इस  तरह  से  पैसे  नहीं  मांगे  थे .

फिर  वह  उठ  कर  बेटे  के  कमरे  में  गया  और बोला , " क्या तुम सो  रहे  हो ?", "नहीं " जवाब  आया .

" मैं  सोच  रहा  था  कि  शायद  मैंने  बेकार  में  ही  तुम्हे  डांट  दिया , दरअसल  दिन भर  के  काम  से  मैं  बहुत

थक   गया  था ." व्यक्ति  ने  कहा .

"I am sorry….ये  लो  अपने  पचास  रूपये ." ऐसा  कहते  हुए  उसने  अपने  बेटे  के  हाथ  में  पचास  की  नोट  रख  दी .

"Thank You पापा " बेटा  ख़ुशी  से  पैसे  लेते  हुए  कहा , और  फिर  वह  तेजी  से  उठकर  अपनी  आलमारी  की  तरफ   गया , वहां  से  उसने  ढेर  सारे  सिक्के  निकाले  और  धीरे -धीरे  उन्हें  गिनने  लगा .

यह  देख  व्यक्ति  फिर  से  क्रोधित  होने  लगा , " जब  तुम्हारे  पास  पहले  से  ही  पैसे  थे  तो  तुमने   मुझसे  और  पैसे  क्यों  मांगे ?"

" क्योंकि  मेरे  पास पैसे कम  थे , पर  अब  पूरे  हैं " बेटे  ने  कहा .

" पापा  अब  मेरे  पास  100 रूपये  हैं . क्या  मैं  आपका  एक  घंटा  खरीद  सकता  हूँ ? Please आप ये पैसे ले लोजिये और  कल  घर  जल्दी  आ  जाइये  , मैं  आपके  साथ  बैठकर  खाना  खाना  चाहता  हूँ ."

दोस्तों ,  इस तेज रफ़्तार जीवन में हम कई बार खुद को इतना busy कर लेते हैं कि उन लोगो के लिए  ही समय नहीं निकाल पाते जो हमारे जीवन में सबसे ज्यादा importance रखते हैं. इसलिए हमें ध्यान रखना होगा कि इस आपा-धापी में भी हम अपने माँ-बापजीवन साथीबच्चों और अभिन्न मित्रों के लिए समय निकालेंवरना एक दिन हमें भी अहसास होगा कि हमने छोटी-मोटी चीजें पाने के लिए कुछ बहुत बड़ा खो दिया.

—————————————————-

Saturday, August 11, 2012

100 Year Old Sets Cycling Record

Proving that age is no barrier to cycling, Frenchman Robert Marchand has established a cycling world hour record for riders over 100 years old.

Marchand, who turned 100 a few months ago, completed 24.251km around the velodrome at the World Cycling Centre in Aigle, Switzerland. "But I'm not playing at being a champion," he said. "I just wanted to do something for my 100th birthday."

He rode a standard track bike with no aero equipment for his attempt, his biggest problem being his familiarity with velodrome riding. "I haven't cycled on a track for 80 years," he said. "You have to get used to the fixed gear! I prefer cycling outside but that is impossible at the moment. I don't want to catch the flu. So I am short on training."

 
During his preparation, Marchand was warned not to get his heart rate above 110, a rule that for the most part he obeyed. "I did climb a steep hill not long ago and went up to 134 but it's best to avoid that," he said. "But I would be very surprised if I had heart attack.

 
"For the last five years I have decided not to go for rides of more than 100km. There is no point going overboard. I want to keep cycling for some time yet."

 
He claimed his 'secret' was none other than looking after himself. "I've never abused anything. I don't smoke, I never drank much. The only thing I did in excess was work. I retired at 89 years old!

 
"But basically, I am like everybody. I am lucky that I haven't had any major health problems. My advice to anyone, young or old, is to keep moving. I do 'physical culture' every day. It works out my whole body and keeps me supple. Some people when they reach 80 years old, start playing cards and they stay immobile. Not me. I've never been able to keep still."

अच्छाई से क्यूँ बाज़ आऊं ?



अच्छाई से क्यूँ बाज़ आऊं ?

 

एक बार हजरत बायेजीद बुस्तामी अपने कुछ दोस्तों के साथ दरिया के किनारे बेठे थे, उनकी  नज़र एक बिच्छू पर पड़ी जो पानी में डूब रहा था. हजरत ने उसे डूबने से बचाने के लिए पकड़ा तो उसने डंक मार दिया. कुछ देर बाद वो दोबारा पानी में जा गिरा , इस बार फिर हज़रत उसे बचने के लिए आगे बढे, पर उसने फिर डंक मार दिया . चार बार ऐसा ही हुआ, तब एक दोस्त से रहा न गया तो उसने पूछा हुजुर आपका ये काम हमारी समझ के बाहर है, ये डंक मार रहा है और आप इसे बचने से बाज़ नहीं आते. उन्होंने बहुत तकलीफ में मुस्कुराते हुए कहा कि जब ये बुराई से बाज़ नहीं आता तो मैं अच्छाई से क्यूँ बाज़ आऊं!!!

———————————————————

   मजदूरों जैसी ज़िन्दगी 

 हजरत सिद्दीक अकबर रज़ी० खलीफा हो गए थे. उनके वेतन पर विचार किया जा  रहा था. उन्होंने कहा कि मदीने में एक मजदूर की रोजाना की कमाई कितनी है… उतनी ही रक़म मेरे लिए भी तय कर दी जाये. यह सुन,साथियों में से कोई बोला- सिद्दीक इतनी कम रक़म में आपका गुज़ारा कैसे होगा ? हजरत सिद्दीक ने जवाब दिया- मेरा गुज़ारा उसी तरह होगा जिस तरह एक मजदूर का होता है. अगर न हुआ तो मैं मजदूरों की आमदनी बढ़ा दूंगा ताकि मेरा वेतन भी बढ़ जाये. जैसे-जैसे मजदूरों की मजदूरी बढ़ेगी मेरी  ज़िन्दगी का स्तर भी बढ़ता जायेगा.

———————————————————

पडोसी 

इमाम अबू हनीफ के पड़ोस में एक मोची रहता था. वह दिन भर तो अपनी झोंपड़ी के दरवाज़े पर सुकून से बैठकर जूते गांठता रहता मगर शाम को शराब पीकर उधम मचाता और जोर-जोर से गाने गाता. इमाम अपने मकान के किसी कोने में रात भर हर चीज़ से बेपरवा इबादत में मशगूल रहते. पडोसी का शोर उनके कानो तक पहुँचता मगर उन्हें कभी गुस्सा नहीं आता. एक रात उन्हें उस मोची का शोर सुनाई नहीं दिया . इमाम बेचैन हो गए और बेचैनी से सुबह का इंतज़ार करने लगे. सुबह होते ही उन्होंने आस-पड़ोस में मोची के बारे में पूछा. मालूम हुआ कि सिपाही उसे पकड़ कर ले गए हैं क्यूंकि वह रात में शोर मचा मचा कर दूसरों कि नींदें हराम करता था. 

उस समय खलीफा मंसूर की हुकूमत थी. बार-बार आमंत्रित करने पर भी इमाम ने कभी उसकी देहलीज़ पर कदम नहीं रखा था मगर उस रोज़ वह पडोसी को छुड़ाने के लिए पहली बार खलीफा के दरबार में पहुंचे. खलीफा को उनका मकसद मालूम हुआ तो वह कुछ देर रुका फिर कहा – "हजरत ये बहुत ख़ुशी का मौका है कि आप दरबार में तशरीफ़ लाये. आपकी इज्ज़त में हम सिर्फ आपके पडोसी नहीं बल्कि तमाम कैदियों कि रिहाई का हुक्म देते हैं ". इस वाकये का इमाम के पडोसी पर इतना गहरा असर हुआ कि उसने शराब छोड़ दी और फिर उसने मोहल्ले वालों को कभी परेशान नहीं किया.

Monday, August 6, 2012

How to Become an Early Riser


 कैसे डालें सुबह जल्दी उठने की आदत?

It is well to be up before daybreak, for such habits contribute to health, wealth, and wisdom.
   -Aristotle

सूर्योदय  होने  से  पहले  उठाना  अच्छा  होता  है , ऐसी  आदत  आपको  स्वस्थ , समृद्ध  और  बुद्धिमान  बनती  है .

-अरस्तु 

 सुबह  उठने  वाले  लोग  पैदाईशी  ऐसे  होते  हैं  या   ऐसा  बना  जा  सकता  है ? मेरे  case में  तो  निश्चित  रूप  से  मैं  ऐसा  बना  हूँ . जब  मैं  बीस  एक  साल  का  था  तब  शायद  ही  कभी  midnight से  पहले  बिस्तर  पे  जाता  था . और  मैं  लगभग  हमेशा  ही  देर  से  सोता  था. और  अक्सर  मेरी  गतिविधियाँ  दोपहर  से  शुरू  होती  थीं .

पर  कुछ  समय  बाद  मैं  सुबह  उठने  और  successful  होने  के  बीच  के  गहरे  सम्बन्ध  को  ignore नहीं  कर  पाया , अपनी  life में  भी . उन  गिने  – चुने  अवसरों  पर  जब  भी   मैं  जल्दी  उठा  हूँ  तो  मैंने  पाया  है  कि  मेरी  productivity लगभग  हमेशा  ही  ज्यादा  रही  है , सिर्फ  सुबह  के  वक़्त  ही  नहीं  बल्कि  पूरे  दिन . और  मुझे  खुद अच्छा  होने  का  एहसास  भी  हुआ  है . तो  एक  proactive goal-achiever होने  के  नाते  मैंने सुबह  उठने  की  आदत  डालने  का  फैसला  किया . मैंने  अपनी  alarm clock 5 am पर  सेट  कर  दी …

— और  अगली  सुबह  मैं  दोपहर  से  just पहले  उठा .

ह्म्म्म…………

मैंने  फिर  कई  बार  कोशिश  की , पर  कुछ  फायदा  नहीं  हुआ .मुझे  लगा  कि  शायद  मैं  सुबह  उठने  वाली  gene के  बिना  ही  पैदा  हुआ  हूँ . जब  भी  मेरा  alarm बजता  तो  मेरे  मन  में  पहला  ख्याल  यह  आता  कि  मैं  उस  शोर  को  बंद  करूँ  और  सोने  चला  जून . कई  सालों  तक  मैं  ऐसा  ही  करता  रहा , पर  एक  दिन  मेरे  हाथ  एक  sleep research लगी  जिससे  मैंने  जाना  कि  मैं  इस  problem को  गलत  तरीके  से  solve कर  रहा  था . और  जब  मैंने  ये  ideas apply   कीं  तो  मैं  निरंतर  सुबह   उठने  में  कामयाब  होने  लगा .

गलत  strategy के  साथ  सुबह  उठने  की  आदत  डालना  मुश्किल  है  पर  सही  strategy के  साथ  ऐसा  करना  अपेक्षाकृत  आसान  है .

सबसे  common गलत  strategy है  कि  आप  यह  सोचते  हैं  कि  यदि  सुबह  जल्दी  उठाना  है  तो  बिस्तर  पर  जल्दी  जाना  सही  रहेगा . तो  आप  देखते  हैं  कि  आप  कितने  घंटे  की  नीद  लेते  हैं , और  फिर  सभी  चीजों  को  कुछ  गहनते  पहले  खिसका  देते  हैं . यदि  आप  अभी  midnight से  सुबह  8 बजे  तक  सोते  हैं  तो  अब  आप  decide करते  हैं  कि  10pm पर  सोने  जायेंगे  और  6am पर  उठेंगे .  सुनने  में  तर्कसंगत  लगता  है  पर  ज्यदातर  ये  तरीका  काम  नहीं  करता .

ऐसा  लगता  है  कि  sleep patterns को  ले  के  दो  विचारधाराएं हैं . एक  है  कि  आप  हर  रोज़  एक  ही  वक़्त  पर  सोइए  और  उठिए . ये  ऐसा  है  जैसे  कि  दोनों  तरफ  alarm clock लगी  हो —आप  हर  रात  उतने  ही  घंटे  सोने  का  प्रयास  करते  हैं . आधुनिक  समाज  में  जीने  के  लिए  यह  व्यवहारिक  लगता  है . हमें  अपनी  योजना  का  सही  अनुमान  होना  चाहिए . और  हमें  पर्याप्त  आराम  भी  चाहिए .

दूसरी  विचारधारा  कहती  है  कि  आप  अपने  शरीर  की  ज़रुरत  को  सुनिए  और  जब  आप  थक  जायें  तो  सोने  चले  जाइये  और  तब  उठिए  जब  naturally आपकी  नीद  टूटे . इस  approach की  जड़  biology में  है . हमारे  शरीर  को  पता  होना  चाहिए  कि  हमें  कितना  rest चाहिए , इसलिए  हमें  उसे  सुनना  चाहिए .

Trial and error से  मुझे  पता  चला  कि  दोनों  ही  तरीके  पूरी  तरह  से  उचित  sleep patterns नहीं  देते . अगर  आप  productivity की  चिंता  करते  हैं  तो  दोनों  ही  तरीके  गलत  हैं . ये  हैं  उसके  कारण :

यदि  आप  निश्चित  समय  पे  सोते  हैं  तो  कभी -कभी  आप  तब  सोने  चले  जायेंगे  जब  आपको  बहुत  नीद  ना  आ  रही  हो . यदि  आपको  सोने  में  5 मिनट  से  ज्यादा  लग रहे  हों  तो  इसका  मतलब  है  कि  आपको  अभी  ठीक  से  नीद  नहीं  आ  रही  है . आप  बिस्तर  पर  लेटे -लेटे अपना  समय  बर्वाद  कर  रहे  हैं ; सो  नहीं  रहे  हैं . एक  और  problem ये  है  कि  आप  सोचते  हैं  कि  आपको  हर  रोज़  उठने  ही  घंटे  की  नीद  चाहिए , जो  कि  गलत  है . आपको  हर  दिन  एक  बराबर  नीद  की  ज़रुरत  नहीं  होती .

यदि  आप  उतना  सोते  हैं  जितना  की  आपकी  body आपसे  कहती  है  तो  शायद  आपको  जितना  सोना  चाहिए  उससे  ज्यादा  सोएंगे —कई  cases में  कहीं  ज्यादा , हर  हफ्ते  10-15 घंटे  ज्यदा ( एक  पूरे  waking-day के  बराबर ) ज्यादातर  लोग  जो  ऐसे  सोते  हैं  वो  हर  दिन  8+ hrs सोते  हैं , जो  आमतौर  पर  बहुत  ज्यादा  है . और  यदि  आप  रोज़  अलग -अलग  समय  पर  उठ  रहे  हैं  तो  आप  सुबह  की  planning सही  से  नहीं  कर  पाएंगे . और  चूँकि  कभी -कभार  हमारी  natural rhythm घडी से  मैच  नहीं  करती  तो  आप  पायंगे  कि  आपका  सोने  का  समय  आगे  बढ़ता  जा   रहा  है .

मेरे  लिए  दोनों  approaches को  combine करना  कारगर  साबित  हुआ . ये  बहुत  आसान  है , और  बहुत  से  लोग  जो  सुबह  जल्दी  उठते  हैं , वो  बिना  जाने  ही  ऐसा  करते  हैं , पर  मेरे  लिए  तो  यह  एक  mental-breakthrough था . Solution ये  था  की  बिस्तर  पर  तब  जाओ  जब  नीद  आ  रही  हो  ( तभी  जब  नीद  आ  रही  हो ) और  एक  निश्चित  समय  पर  उठो ( हफ्ते  के  सातों  दिन ). इसलिए  मैं  हर  रोज़  एक  ही  समय  पर  उठता  हूँ ( in my case 5 am) पर  मैं  हर  रोज़  अलग -अलग  समय  पर  सोने  जाता  हूँ .

मैं  बिस्तर  पर  तब  जाता  हूँ  जब  मुझे  बहुत  तेज  नीद  आ  रही  हो . मेरा  sleepiness test ये  है  कि  यदि  मैं  कोई  किताब  बिना  ऊँघे  एक -दो  पन्ने  नहीं  पढ़  पाता  हूँ  तो  इसका  मतलब  है  कि  मै  बिस्तर  पर  जाने  के  लिए  तैयार  हूँ .ज्यादातर  मैं  बिस्तर  पे  जाने  के  3 मिनट  के  अन्दर  सो  जाता  हूँ . मैं  आराम  से  लेटता  हूँ  और  मुझे  तुरंत  ही  नीद  आ  जाति  है .  कभी  कभार  मैं  9:30 पे  सोने  चला  जाता  हूँ  और  कई  बार  midnight   तक  जगा  रहता  हूँ . अधिकतर  मैं  10 – 11 pm के  बीच  सोने चला  जाता  हूँ .अगर  मुझे   नीद  नहीं   आ  रही  होती  तो  मैं  तब  तक  जगा  रहता  हूँ  जब  तक  मेरी  आँखें  बंद  ना  होने  लगे . इस  वक़्त  पढना  एक  बहुत  ही  अच्छी activity है , क्योंकि  यह  जानना  आसान  होता  है  कि  अभी  और  पढना  चाहिए  या  अब  सो  जाना  चाहिए .

जब  हर  दिन  मेरा  alarm बजता  है  तो  पहले  मैं  उसे  बंद  करता  हूँ , कुछ  सेकंड्स  तक  stretch करता  हूँ , और  उठ  कर  बैठ  जाता  हूँ . मैं  इसके  बारे  में  सोचता  नहीं . मैंने  ये  सीखा  है  कि  मैं  उठने  में  जितनी  देर  लगाऊंगा ,उतना  अधिक  chance है  कि  मैं  फिर  से  सोने  की  कोशिश  करूँगा .इसलिए  एक  बार  alarm बंद  हो  जाने के  बाद  मैं  अपने  दिमाग  में  ये  वार्तालाप  नहीं  होने  देता  कि  और  देर  तक  सोने  के  क्या  फायदे  हैं . यदि  मैं  सोना  भी  चाहता  हूँ , तो  भी  मैं  तुरंत  उठ  जाता  हूँ .

इस  approach को  कुछ  दिन  तक  use करने  के  बाद  मैंने  पाया  कि  मेरे  sleep patterns एक  natural rhythm में  सेट  हो  गए  हैं . अगर  किसी  रात  मुझे  बहुत  कम  नीद  मिलती  तो  अगली  रात  अपने  आप  ही  मुझे  जल्दी  नीद  आ  जाती  और  मैं  ज्यदा  सोता . और  जब  मुझमे  खूब  energy होती  और  मैं  थका  नहीं  होता  तो  कम  सोता . मेरी  बॉडी  ने  ये  समझ  लिया  कि  कब  मुझे  सोने  के  लिए  भेजना  है  क्योंकि  उसे  पता  है  कि  मैं  हमेशा  उसी  वक़्त  पे  उठूँगा  और  उसमे  कोई  समझौता नहीं  किया  जा  सकता .

इसका  एक  असर ये हुआ कि  मैं  अब  हर  रात  लगभग  90 मिनट  कम  सोता  ,पर  मुझे  feel होता  कि  मैंने  पहले  से ज्यादा  रेस्ट  लिया  है . मैं  अब  जितनी  देर  तक  बिस्तर  पर  होता  करीब  उतने  देर  तक  सो  रहा  होता .

मैंने  पढ़ा  है  कि  ज्यादातर  अनिद्रा  रोगी  वो  लोग  होते  हैं  जो  नीद  आने  से  पहले  ही  बिस्तर  पर  चले  जाते  हैं . यदि  आपको  नीद  ना  आ  रही  हो  और  ऐसा  लगता  हो  कि  आपको  जल्द ही  नीद  नहीं  आ  जाएगी  , तो  उठ  जाइये  और  कुछ  देर  तक  जगे  रहिये . नीद  को  तब  तक  रोकिये  जब  तक  आपकी  body ऐसे  hormones ना  छोड़ने  लगे  जिससे आपको नीद ना आ जाये.अगर  आप  तभी  bed पे  जाएँ  जब  आपको  नीद  आ  रही  हो  और  एक  निश्चित  समय  उठें  तो  आप  insomnia का  इलाज  कर  पाएंगे .पहली  रात  आप  देर  तक  जागेंगे  , पर  बिस्तर  पर  जाते  ही  आपको  नीद  आ  जाएगी . .पहले  दिन  आप  थके  हुए  हो  सकते  हैं  क्योंकि  आप  देर  से  सोये  और  बहुत  जल्दी  उठ  गए , पर  आप  पूरे  दिन  काम  करते  रहेंगे  और  दूसरी  रात  जल्दी  सोने  चले  जायेंगे .कुछ  दिनों  बाद  आप  एक  ऐसे  pattern में  settle हो  जायेंगे  जिसमे  आप  लगभग  एक  ही  समय  बिस्तर  पर  जायंगे  और  तुरंत  सो  जायंगे .

इसलिए   यदि  आप  जल्दी  उठाना  चाहते  हों  तो  ( या  अपने  sleep pattern को  control करना  चाहते  हों ), तो  इस  try करिए :  सोने  तभी  जाइये  जब  आपको  सच -मुच  बहुत  नीद  आ रही  हो  और  हर  दिन  एक  निश्चित  समय  पर  उठिए .

————————————————————————–

Soul Sustenance & Message for the day 06-08-2012


Soul Sustenance 06-08-2012
----------------------------------------------------------

Rising Above The Expectation Of Praise From Others 

Sometimes, we get offended or ill almost on purpose in order to receive special treatment. Out of a lack of self-esteem and insecurity, we depend on the appreciation and affection of the other, for them to value us, praise us and always to speak kindly to us. Even though they have given us many signs of appreciation, if for a few days they give us none, our inner world or our self-esteem collapses. We become dependent on what others do, or don't do, in relation to us, whether or not they nourish our self-esteem, and then what happens? We are always waiting for the other to give us something when in reality we can give it to ourselves. 

Spirituality makes us experience our internal treasures of bliss, happiness, love and power. It makes us aware that we are givers, emitters and radiators of these qualities rather than takers. This consciousness helps us rise up above the above discussed dependencies and remain seated, stable on our throne of self-respect. 

----------------------------------------------------------
Message for the day 06-08-2012
----------------------------------------------------------

The one who is responsible is the one who constantly has good wishes. 

Expression: To be responsible means to recognise the importance of one's own role. That means there is the understanding that others' transformation is dependent on one's own transformation. When there is the recognition of one's responsibility, there is naturally alertness. This alertness brings good wishes for even the ones who are not being positive. 

Experience: When I am able to maintain good feelings for all those I come into contact with me, I find my relations gradually improving. I also find that I am ready to take up the challenge of changing myself before I can think of changing others. Due to this, others continue to take inspiration from me and bring about a change in themselves too. 


In Spiritual Service,
Brahma Kumaris

Sunday, August 5, 2012

Soul Sustenance & Message for the day 05-08-2012

Soul Sustenance & Message for the day 05-08-2012

----------------------------------------------------------

Soul Sustenance 05-08-2012
----------------------------------------------------------

Detached Observation – A Spiritual Skill 

Detachment is the basis of our ability to be positive and affectionate with others while we interact with them. This is what is known as commitment and the relationship of detachment and it begins with what is known as a spiritual skill: the skill of being a detached observer. 

On needs to be a detached observer in two dimensions: one within and one outside: 

The inner art of detached observation is the ability of separating ourselves from our own thoughts, emotions, attitudes and behavior. On the external level, the art of detached observation is the art of being witness to the scenes that take place around us. While we detach ourselves and observe how the game of life develops, without being active participants, we are able to see the "big picture" with greater clarity. That makes it easier to see clearly what role we have to play and where our contribution lies. We are creators, and our thoughts, emotions and attitudes are our own work. 

In reality, detached observation is the first step towards personal strengthening. If we don't manage to detach ourselves from our thoughts and emotions, they will turn into our owners and will consume our energy. 

For the practice of meditation it is essential that you act as a witness of everything you think and feel, and, once some time has passed, you will find that the practice simultaneously frees you and offers power. 

----------------------------------------------------------
Message for the day 05-08-2012
----------------------------------------------------------

To finish waste questions is to find a solution. 

Expression: When a difficult situation comes up there are waste questions in the mind either about the past or about the future. Questions like 'why did it happen like this?' or 'What will happen now?' are very common. But to keep the mind busy with waste questions is to block it from using its capability of finding solutions. On the other hand, to finish waste questions, means to keep the mind free for finding solutions. 

Experience: When I keep my mind free from waste questions, I am able to be alert and find the right answer to every problem. I have the confidence and I know that every problem has a solution. When I keep my mind in the present by freeing myself of waste questions, I am able to quickly and easily find the solution and find myself moving towards success even in all challenging situations.